Description
यह संकलन हिंसा की उन जीती-जागती वास्तविक्ताओं के बारे में बताता है जो बस्तियों में, गाँवों में, सभी जगह जहाँ जहाँ भी विमुक्त समुदाय बसे हैं, वहाँ रोज़ाना घटती हैं। जघन्य अपराधिक जनजाति कानून को 1952 में निरस्त किया गया| इसके बावजूद जातिगत भेद को जायज़ मानने वाले समाज में पुलिस थानों और अन्य राजकीय संस्थानों में रोज़ाना की यातना और हाशिएकृत लोगों का अपराधीकरण, उचित ही ठहराया गया है – लोगों को तोड़ते हुए, परिवारों को बिखेरते हुए, और सीधे-सीधे समुदायों को भयानक स्थिति में धकेलते हुए|
शेरू, अमर, सोयना, शंकर और तुलसीदास, इन पर हिरासत में हुई हिंसा और आठ साल की रिहाना पर ईंटों से हुए वार की इन जाँच रिपोर्ट को पढ़ते हुए हम देखते हैं किस कदर व्यवस्था ने लोगों को लगातार धोखा दिया है। इन हत्याओं को न्याय मिलने से ढांचागत इनकार उतना ही बड़ा व्यवस्थागत अपराध है जितना वर्दी पहने अधिकारियों द्वारा की गई हिंसा और क्रूरता।
इस किताब में साथ हैं उन लोगों के लेख जिन्होंने इन हकीकतों को जीया है, और वे जो समुदाय के साथ गहराई से जुड़े हैं, जिससे पाठक को ऐसी परिस्थितियों को समझने के लिए ऐतिहासिक, समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक नज़रिया मिलता है। न्याय और आज़ादी के मूल्य, जो संविधान में प्रतिष्ठापित हैं, शायद इन क्रूर वास्तविक्ताओं के खिलाफ़ एक उम्मीद की तरह दिखें, लेकिन यह आवाज़ें इस औपनिवेशिक वसीयत की दर्दनाक परतों को ज़ाहिर करती हैं, और साथ ही इन विषम परिस्थितियों में ज़िन्दा रहने की ताकत और हिम्मत को भी उजागर करती हैं।




